रमण गीतम्

 

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१. सत् रमण हो, चित् रमण हो
२. काया में है नहीं प्राण प्रभु
३. भव की पीड़ा हुई है भारी
४. हैं प्रभु तेरी शरण में
५. प्रेम रूप है रमण प्रभु का

 

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